Thursday, 6 September 2018

SC/ST PREVENTION OF ATROCITIES ACT - 1989

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम(1989 )

SC & ST 1989 अधिनियम भारतीय समाज को परंपरागत अन्धविश्वाशो तथा अतार्किक से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से लाया गया था। लेकिन दलितों के हितों की रक्षा के लिये सबसे पहले 1955 में अस्पृश्यता अर्थात अपराध निवारण अधिनियम लाया गया था, जिसकी कमियों एवं कमज़ोरियों के कारण सरकार को इसमें व्यापक सुधार करना पड़ा। सुधारों और संशोधनों के बाद 1976 से इस अधिनियम को नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम के रूप में पुनर्गठन किया गया। 
SC & ST ACT 1989                 
                                                                     अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के अनेक उपाय करने के बावजूद उनकी स्थिति दयनीय बनी रही। उन्हें अपमानित एवं उत्पीड़ित किया जाता रहा। उन्होंने जब भी अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहा, तब उन्हें दबाने एवं आतंकित करने जैसी घटनाएँ सामने आईं। अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों का उत्पीड़न रोकने तथा दोषियों पर कार्रवाई करने के लिये विशेष अदालतों के गठन को आवश्यक समझा गया। उत्पीड़न के शिकार लोगों को राहत, पुनर्वास उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती थी। 
                                                                           इसी पृष्ठभूमि में अनुच्छेद 17 के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 बनाया गया था। इस अधिनियम का स्पष्ट उद्देश्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगो को न्याय दिलाना था ताकि समाज में वे गरिमा के साथ रह सकें। इस अधिनियम में 2015 में संशोधन कर इसके प्रावधानों को और कठोर बनाया गया। वर्तमान में इसमें पाँच अध्याय और 23 धाराएँ हैं।

संशोधन के बाद प्रमुख प्रावधान: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध किये जाने वाले नए अपराधों में निम्नलिखित शामिल हैं।
  • सिर और मूंछ के बालों का मुंडन कराना 
  • अत्याचारों में समुदाय के लोगों को जूते की माला पहनाना
  • सिंचाई सुविधाओं तक जाने से रोकना या वन अधिकारों से वंचित रखना
  • मानव और पशु नरकंकाल को निपटाने और लाने-ले जाने के लिये बाध्य करना
  • कब्र खोदने के लिये बाध्य करना
  • सिर पर मैला ढोने की प्रथा का उपयोग और अनुमति देना
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं को देवदासी के रूप में समर्पित करना
  • जातिसूचक शब्द कहना
  • जादू-टोना अत्याचार को बढ़ावा देना
  • सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करना
  • चुनाव लड़ने में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोकना
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं को वस्त्रहरण कर आहत करना
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के किसी सदस्य को घर-गाँव और आवास छोड़ने के लिये बाध्य करना
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पूजनीय वस्तुओं को विरूपित करना
  • अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्य के विरुद्ध यौन दुर्व्यवहार करना, यौन दुर्व्यवहार भाव से उन्हें छूना और भाषा का उपयोग करना 
अन्य संवैधानिक प्रावधान:
  • संविधान के अनुच्छेद 46 में राज्‍य से अपेक्षा की गई है कि वह समाज के कमज़ोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों का ध्‍यान रखते हुए उन्‍हें सामाजिक अन्‍याय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रखेगा।
  • शैक्षणिक संस्‍थानों में आरक्षण का प्रावधान अनुच्‍छेद 15(4) में किया गया है।
  • पदों एवं सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्‍छेद 16(4), 16(4क) और 16(4ख) में किया गया है।
  • मूल अधिकारों के अलावा अनुच्छेद 330, 332 और 335 में केंद्र और राज्यों की विधायिकाओं में इन समुदायों के लिये विशेष प्रतिनिधित्व एवं सीटों के आरक्षण के लिये प्रावधान हैं। 
  • अनुच्छेद 338 से 342 और संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची अनुच्छेद 46 में दिये गए लक्ष्यों हेतु विशेष प्रावधानों के संबंध में कार्य करते हैं।
10 वर्ष से कम की सज़ा का प्रावधान वाले अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को आहत करने, उन्हें पीड़ा पहुँचाने, धमकाने और उपहरण करने जैसे अपराधों को अधिनियम में अपराध के रूप में शामिल किया गया। इसे पूर्व अधिनियम के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर किये गए अत्याचार के मामलों में 10 वर्ष और उससे अधिक की सज़ा वाले अपराधों को ही अपराध माना जाता था। 
                                                                              मामलों को तेज़ी से निपटाने के लिये अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों में विशेष रूप से मुकदमा चलाने के लिये विशेष अदालतें बनाना और विशेष लोक अभियोजक को निर्दिष्ट करना। विशेष अदालतों को अपराध का प्रत्यक्ष संज्ञान लेने की शक्ति प्रदान करना और जहाँ तक संभव हो आरोप-पत्र दाखिल करने की तिथि से दो महीने के अंदर सुनवाई पूरी करना। 
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