Tuesday, 11 September 2018

पेरिस समझौता (PARIS AGREEMENT)

पेरिस समझौता (PARIS AGREEMENT)

प्राकृतिक संसाधनों के अत्याधिक दोहन और मानवीय क्रियाओं के कारण वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड, मीथेन आदि गैसों की मात्रा बढ़ती जा रही है। कार्बनडाई-ऑक्साइड जैसी गैसें ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को गर्म रखने का कार्य करती हैं। यदि वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड उपस्थित न होती तो पृथ्वी एक बर्फीले रेगिस्तान से अधिक और कुछ नहीं होती। लेकिन वायुमंडल में CO2 की मात्रा बढ़ने से जितनी ऊष्मा पृथ्वी को गर्म रखने के लिये चाहिये उससे कहीं ज़्यादा ऊष्मा CO2 द्वारा रोक ली जा रही है, जिसके कारण औसत तापमान में खतरनाक वृद्धि हुई है। यही ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ना है और जब ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी तो ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलेगी, समुद्र का जल-स्तर बढ़ेगा और दुनिया के कई बड़े शहर जलमग्न हो जाएंगे।
PARIS AGREEMENT

PARIS AGREEMENT

                                                                                                                            जलवायु परिवर्तन की इस समस्या निपटने के लिए फ्रांस के पेरिस शहर में वर्ष 2015 में 30 नवंबर से लेकर 11 दिसंबर तक 195 देशों की सरकारों के प्रतिनिधियों ने एक नए वैश्विक समझौते पर चर्चा की । और इस वैश्विक समझौते को ही पेरिस समझौता के नाम से जाना जाता है

पेरिस समझौते में तय लक्ष्य:
  • पेरिस समझौते का मुख्य उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान को इस सदी के अंत तक औद्योगिकीकरण के पूर्व के समय के तापमान के स्तर से 2 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक नहीं होने देना है।
  • पेरिस समझौता मूलतः मानवीय गतिविधियों द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को सीमित करने पर आधारित है।  साथ ही, यह समझौता उत्सर्जन को कम करने के लिये प्रत्येक देश के योगदान की समीक्षा करने की आवश्यकता का उल्लेख भी करता है।
  • इसके अंतर्गत ही राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान की संकल्पना को प्रस्तावित किया गया है और  प्रत्येक राष्ट्र से यह अपेक्षा की गई है कि वह ऐच्छिक तौर पर अपने लिये उत्सर्जन के लक्ष्यों का निर्धारण करे।
  • पेरिस समझौते में प्रावधान है कि विकसित देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिये गरीब देशों को जलवायु वित्त प्रदान करके सहायता करनी चाहिये।
भारत का राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान:
  • भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के तहत वर्ष 2030 तक अपनी उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है।
  • भारत ने वृक्षारोपण और वन क्षेत्र में वृद्धि के माध्यम से 2030 तक 2.5 से 3 बिलियन टन CO2 के बराबर कार्बन सिंक बनाने का वादा किया है।
  • भारत कर्क और मकर रेखा के बीच अवस्थित सभी देशों के एक वैश्विक सौर गठबंधन के मुखिया के तौर पर कार्य करेगा।
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