Thursday, 6 September 2018

धारा 377 INDIAN PENAL CODE SECTION 377

IPC की धारा 377 (INDIAN PENAL CODE SECTION 377)

IPC की धारा 377 का संबंध अप्राकृतिक शारीरिक संबंधों से है। इसके अनुसार यदि दो लोग आपसी सहमति अथवा असहमति से आपस में अप्राकृतिक संबंध बनाते हैं और दोषी करार दिए जाते हैं तो उनको 10 वर्ष से लेकर उम्रकैद तक की सजा़ हो सकती है। अधिनियम में इस अपराध को संज्ञेय तथा गैर-जमानती अपराध माना गया है।
                                  यद्यपि व्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्त्व देते हुए 2009 में हाईकोर्ट ने आपसी सहमति से एकांत में बनाए जाने वाले समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर करने का निर्णय दिया था। किंतु 2013 में सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा समलैंगिकता की स्थिति में उम्रकैद के प्रावधान को पुनः बहाल करने का फैसला दिया गया।

ऐसे में निम्नलिखित आधारों पर इस कानून पर विचार किया जा सकता है:
  • सामान्य रूप में देखा जाए तो यह कानून न केवल काल की दृष्टि से पुराना है बल्कि अतार्किक भी है जो व्यक्ति के चयन की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है।  
  • हमारे न्यायालय में भी जीवन की स्वतंत्रता के तहत चयन के अधिकार को आधारभूत माना है। 
  • व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तभी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, जब उसके कार्यों से अन्य व्यक्तियों को हानि पहुंचती हो। व्यवहार में देखा जाए तो एकांत में आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध का बनाया जाना समाज के अन्य लोगों के हितों को प्रभावित नहीं करता। 
  • यद्यपि संविधान के अनुच्छेद 19( 2) के तहत युक्ति-युक्त प्रतिबंधों में नैतिकता के आधार पर कुछ लोग इसका विरोध कर सकते हैं किंतु नैतिकता की अवधारणा अपने आप में वस्तुनिष्ठ नहीं है और इस आधार पर समाज के एक वर्ग के लोगों की सामान्य  इच्छाओं का विरोध अनुचित है। 
  • इसके अलावा दंड के आधार पर किसी व्यक्ति की चयन कि स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करना धारणीय भी नहीं है। इसके लिये व्यक्ति के अंदर ऐसे मूल्यों का निर्माण किया जाना ज्यादा प्रभावी होगा कि वे स्वयं ही ऐसे कार्यों में शामिल न हों।
आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 (Criminal Tribes Act, 1871): इस अधिनियम ने कई हाशिये वाले आबादी समूहों जैसे-ट्रांसजेंडर को सहज रूप से आपराधी के रूप में ब्रांडेड किया था। वर्ष 1949 में आपराधिक जनजाति अधिनियम को रद्द कर दिया गया था लेकिन धारा 377 अभी भी जारी है धारा 377 के खिलाफ लड़ाई में LGBT समुदाय के अनेक लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है।

INDIAN PENAL CODE SECTION 377

सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 377 रद्दसुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने एकमत से ये फ़ैसला सुनाया है कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है LGBT समुदाय को कलंक न मानें. इसके लिए सरकार को प्रचार करना चाहिए। अफ़सरों को संवेदनशील बनाना होगा जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि भारत के यौन अल्पसंख्यक नागरिकों को छुपना पड़ा LGBT समुदाय को भी दूसरों की तरह समान अधिकार है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इस अधिकार को अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत पहचान मिली है. भारत भी इसकी सिग्नेट्री है कि किसी नागरिक की निजता में घुसपैठ का राज्य को हक नहीं है।
                                                                                    सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को ये कहते हुए रद्द कर दिया। कि धारा 377 संविधान के समानता के अधिकार आर्टिकल 14 का हनन करती है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट यह भी कहा कि समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है।
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